करवा चौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार हैं। जो हिन्दी पंचांग के अनुसार कार्तिक-मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस व्रत का खास उद्देश्य सौभाग्य है। इसलिए इस व्रत को सुहागिन स्त्रियां मानती है। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे से बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद समाप्त होता है। ग्रामीण स्त्रियों से लेकर शहरी महिलाए भी करवा चौथ का व्रत बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती है। स्त्रियां अपनी पति की दीर्घायु एवं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचंद्र गणेश जी की पूजा अर्चना करती है। पूरे दिन निराहार रहकर चंद्रोदय के उपरांत पति के हाथों पानी पीकर महिलाएं अपनी उपवास खत्म करती हैं।
आइए! जानते है इस व्रत की शुरुआत कैसे हुई?
वैसे तो भारत के इतिहास में इस व्रत से जुड़े बहुत सारे कहानिया हैं। लेकिन एक कथा जो सीधे इस व्रत को महाभारत और श्री कृष्ण से जोड़ते हैं।
एक बार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रौपदी बहुत परेशान थी। अर्जुन का कोई खबर न मिलने पर द्रौपदी ने श्री कृष्ण का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा – बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकर जी से की थी। तब शकंर जी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया वही अब मैं तुम्हें बताता हूँ। ध्यान से सुनना।
प्राचीन काल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी। एकबार जब लड़की अपने मायके में थी तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत विधिपूर्वक किया, पूरे दिन निराहार, निर्जला रही। कुछ खाया-पिया नहीं। जिससे उनके चारों भाई परेशान थे। बहन को भूख-प्यास लगी होगी। लेकिन बहन तो चंद्रोदय के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करेंगी। सभी भाइयों ने एक विचार किया क्यों न बहना को एक बनावटी चंद्र दर्शन करा दी जाए।
एक भाई पीपल के पेड़ पर चलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर चलनी से रौशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दिया-देखो, बहन चाँद निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन खुश होते हुए चंद्र दर्शन कर पूजन की और भोजन ग्रहण किया।
भोजन करते ही उनके पति की मृत्यु हो गई। अब तो वो दुखी हो विलाप करने लगी। तभी वहां से रानी इंद्राणी निकल रही थी। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुख का कारण पूछा। इंद्राणी ने बताया-तूने बिना चंद्र दर्शन किए भोजन ग्रहण की इसलिए तुम्हें ये कष्ट मिला। अब तुम दुबारा करवा चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहने पर फिर से चौथ का व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए हे, द्रौपदी तुम भी करवा चौथ का व्रत करो। कृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने करवा चौथ का व्रत किया तो अर्जुन सकुशल वपस लौट आया।
जानिए पूजन विधि व शुभ मुहुर्त :-
✳पूजन सामग्री :-
उस दिन भगवान शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चन्द्रमा का पूजन करें। पूजन करने के लिए बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी बनाकर उपरोक्त वर्णित सभी देवों को स्थापित करें।
नैवेद्य :- शुद्ध घी में आटे को सेंककर उसमें शक्कर अथवा खाँड मिलाकर लड्डू नैवेद्य हेतु बनाए।
करवा :- काली मिट्टी में शक्कर की चासनी मिलाकर उस मिट्टी से तैयार किए गए मिट्टी के करवे या ताँबे के बने हुए करवे 10 या 13 अपने सामर्थ अनुसार रखें।
शुभ मुहुर्त
27 अक्टूबर को करवा चौथ पुजा का शुभ मुहुर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक हैं। तथा रात 8 बजे तक चांद के दर्शन हो सकते हैं।
✳पूजन विधि :-
बालू या सफेद मिट्टी की वेदी पर शिव--पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चन्द्रमा की स्थापना करें। मूर्ती के आभाव में सुपारी पर नाड़ा बांधकर देवता की भावना करके स्थापित करें, तत्पश्चात यथाशक्ति देवों का पूजन करें॥
✳पूजन हेतु निम्न मंत्र बोले :-
ॐ शिवायै नमः' से पार्वती का,
ॐ नमः शिवाय' से शिव का,ॐ षणमुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का, 'ॐ गणेशाय नमः' से गणेश का, तथा
ॐ सोमाय नमः' से चन्द्रमा का पूजन करें।
✳करवों में लड्डू का नैवेद्य रखकर अर्पित करें।
एक लोटा, एक वस्त्र, व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित करें। करवा चौथ व्रत की कथा पढ़े अथवा सुनें॥
सांयकाल चन्द्रमा के उदित हो जाने पर चन्द्रमा का पूजन कर अर्घ्य प्रदान करें । तत्पश्चात ब्राह्मण, सुहागिन स्त्रियों एवं पति के माता-पिता को भोजन कराएँ, भोजन के पश्चात ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा दें॥
पति की माता (सासु-जी) को उपरोक्त रूप से अर्पित लोटा, वस्त्र व विशेष करवा भेंट कर आशीर्वाद लें। यदि वे जीवित न हो तो उनके तुल्य किसी अन्य स्त्री को भेंट करें। इसके पश्चात स्वंय व परिवार के अन्य सदस्य भोजन करें॥

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